भगतसिंह और वीर सावरकर संबंध एवं समन्वय

           
                    शहीद भगत सिंह और वीर सावरकर

विनायक दामोदर सावरकर का संबंध भगत सिंह से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक बेहद दिलचस्प, गहरा और बहुआयामी अध्याय है। वर्तमान राजनीतिक विमर्शों में भले ही इन दोनों को दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा देखा जाता हो, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों, जेल डायरियों और उनके खुद के लेखों से स्पष्ट होता है कि दोनों के बीच क्रांतिकारी सम्मान, वैचारिक प्रभाव और राष्ट्रीय स्वाधीनता का एक साझा सूत्र मौजूद था, भले ही बाद के दिनों में उनके सामाजिक और धार्मिक रास्ते अलग हो गए। 
इन दोनों महान राष्ट्रभक्तों के संबंधों और उनके विचारों की तुलना को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के आधार पर पूरी तरह समझा जा सकता है:
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* भगत सिंह पर सावरकर के साहित्य का प्रभाव: भगत सिंह सावरकर जी के लेखन से गहरे प्रभावित थे। 1924 में 'मतवाला' और 1928 में 'कीर्ति' पत्रिकाओं में लिखे अपने लेखों में भगत सिंह ने सावरकर को "वीर", "विश्व प्रेमी" और "प्रचंड विद्रोही" कहकर संबोधित किया था। 
* 1857 की पुस्तक को बनाया 'गीता': सावरकर की प्रतिबंधित पुस्तक '1857 का स्वातंत्र्य समर' को भगत सिंह अपनी क्रांतिकारी संस्था HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) के क्रांतिकारियों के लिए अनिवार्य पाठ मानते थे। भगत सिंह ने खुद जोखिम उठाकर इस प्रतिबंधित पुस्तक का चौथा संस्करण भारत में गुप्त रूप से छपवाया और वितरित किया था। 
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* जेल डायरी के साक्ष्य: लाहौर जेल में बंद रहने के दौरान भगत सिंह ने जो 'जेल नोटबुक' (Jail Notebook) तैयार की थी, उसमें सावरकर जी की पुस्तक 'हिंदू पदपादशाही' (Hindu Padpadshahi) के कई महत्वपूर्ण उद्धरणों (Quotes) को अपने हाथों से नोट किया था, जो आज भी राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद ऐतिहासिक साक्ष्य है। 
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* साझा क्रांतिकारी विरासत: सावरकर जी ने 1904 में 'अभनव भारत सोसाइटी' बनाई थी और सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना था। भगत सिंह ने इसी सशस्त्र संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाया। दोनों ही मानते थे कि अंग्रेजों को केवल शांतिपूर्ण अपीलों से नहीं, बल्कि शक्ति और सशस्त्र प्रतिरोध से ही भारत से बाहर निकाला जा सकता है। 
* फांसी पर सावरकर की प्रतिक्रिया: जब 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई, तब रत्नागिरी में नजरबंद वीर सावरकर ने इसके विरोध में अपने घर पर काला झंडा फहराया था और इन शहीदों के सम्मान में एक भावुक श्रद्धांजलि कविता लिखी थी। 
* संघर्ष के तरीकों में बदलाव व अंतर: सावरकर का मानना था कि क्रांतिकारी को देश के काम आने के लिए हर संभव कानूनी रास्ते (जैसे दया याचिकाएं या रणनीतिक कूटनीति) का उपयोग करके जेल से बाहर आना चाहिए। इसके विपरीत, भगत सिंह का मानना था कि अदालत को वैचारिक प्रचार का मंच बनाना चाहिए और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लेना चाहिए ताकि उनकी शहादत से देश के करोड़ों युवाओं में क्रांति की लहर पैदा हो सके।
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* जातिवाद का कड़ा विरोध: सामाजिक स्तर पर दोनों के विचार काफी हद तक समान और प्रगतिशील थे। सावरकर जाति प्रथा, छुआछूत और ऊंच-नीच के घोर विरोधी थे। उन्होंने रत्नागिरी में 'पतित पावन मंदिर' की स्थापना की थी, जहाँ सभी जातियों के लोगों को प्रवेश का समान अधिकार था।
* भगत सिंह का सामाजिक दृष्टिकोण: भगत सिंह भी जातिवाद के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने अपने प्रसिद्ध लेख 'अछूत का सवाल' में लिखा था कि समाज को जांत-पांत के बंधनों को तोड़कर मानवीय समानता के आधार पर खड़ा होना होगा।
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यहाँ दोनों के विचारों में सबसे बड़ा और बुनियादी विभाजन (Divergence) दिखाई देता है: 
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* वीर सावरकर (हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद): सावरकर का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक और भौगोलिक था। उन्होंने 'हिंदुत्व' (Hindutva) की अवधारणा दी, जिसके अनुसार जो व्यक्ति भारतभूमि को अपनी पितृभूमि (Fatherland) और पुण्यभूमि (Holy land) मानता है, वह हिंदू है। हालांकि वे स्वयं रूढ़िवादी धार्मिक कर्मकांडों को नहीं मानते थे और एक तार्किक (Rationalist) दृष्टिकोण रखते थे, लेकिन राजनीति में वे हिंदुओं के एकीकरण और सशक्तिकरण के पक्षधर थे।
* भगत सिंह (समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता): भगत सिंह पूरी तरह से नास्तिक और मार्क्सवादी-समाजवादी थे। उन्होंने जेल में अपना प्रसिद्ध लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' (Why I am an Atheist) लिखा था। उनका मानना था कि धर्म और राजनीति को पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए। वे किसी भी प्रकार की धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर एक वर्गविहीन, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी भारत का निर्माण करना चाहते थे जहाँ इंसानों द्वारा इंसानों का शोषण न हो।
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`संक्षेप में कहें तो, वीर सावरकर भगत सिंह के वैचारिक अग्रजों में से एक थे` जिनके शुरुआती क्रांतिकारी साहित्य ने भगत सिंह को गहराई से प्रेरित किया। स्वाधीनता के साझा लक्ष्य और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध पर दोनों में पूर्ण सहमति थी। हालांकि, जैसे-जैसे समय बदला, भगत सिंह ने जहाँ वैश्विक समाजवाद और पूर्ण नास्तिकता का मार्ग चुना, वहीं सावरकर ने अंडमान जेल से लौटने के बाद हिंदू संगठन और सांस्कृतिक हिंदुत्व की राह पकड़ी।

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