बचपन से आज़ादी

                                      बचपन से आज़ादी

बचपने से आज़ादी मांग रहा है, ये कितना नादान है, 

इसे क्या पता ये जीवन का बीतने वाला सबसे सूंदर काल है।

लगता है ये सबसे अमीर इंसान है क्योंकि इसे कोई टोकता है,

जो आज़ाद हो गए उन गरीबों से पूछो उन्हें अब कौन रोकता है,

ये कुछ बरस बिताले अमीरी के धीरे-धीरे खोता हुआ राग है,

इसके आगे बढ़ेगा तो समझेगा ना वैसा अहसास ना फाग है,

आने वाले तेरे जन्मदिन और त्यौहार भी देखेंगे आज़ादी वाले जश्न,

जिसमे तेरे सहकर्मी और यार है लेकिन तू ढूढ़ता अपना खानदान है।

बचपने से आज़ादी मांग रहा है, ये कितना नादान है, 

इसे क्या पता ये जीवन का बीतने वाला सबसे सूंदर काल है।


अभी संघर्ष शुरू नहीं हुआ है इनका या बिन मांगे सब मिला है,

तभी नादानियों में बात कह रहा इसे न होने का अहसास कहां है,

हर कदम चलना या मंजिल की और बढ़ना जिनके दम पे हो रहा है,

क्या मैंने ठीक सुना ये अब उनकी छाया से आज़ादी चाह रहा है,

पछतायेगा अपनी कमियों को दोहराएगा छुपाने को अब कौन है,

जिस ताकत को अपना जान रहा था उसे खोकर अब परेशान है,  

बचपने से आज़ादी मांग रहा है, ये कितना नादान है, 

इसे क्या पता ये जीवन का बीतने वाला सबसे सूंदर काल है।


अभी दूर नहीं है वो दिन जो सबके जीवन में न चाहते आता  है,

पिता के पैसे शौंक में खर्चने वाला अब अपनी कमाई खूब बचाता है,

खिलाने के लिए पीछे-पीछे भागने वाली माँ अब सही चल नहीं पाती  है,

भाई -बहनों का प्यार जब अपने बंधनो में बंट जाता है,

फिर  अकेला  हो  चुका वो  एकांत  में  अपनी  आज़ादी  आंसुओं  में  बहाता  है,

देर  हो  जाने  के  कारण अब वो अपने आजादी की ख़ुशी नहीं बरसी बनाता  है,

बचपने से आज़ादी मांग रहा है, ये कितना नादान है, 

इसे क्या पता ये जीवन का बीतने वाला सबसे सूंदर काल है।


~सक्षम सचदेवा हिंदुस्थानी

9050150185

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