सनातन, विश्वास और मेरे प्रयोग
सनातन, विश्वास और
मेरे प्रयोग
भूमिका
सनातन का अपना अनकहा, अनदेखा, अनछुआ, नासमझा,
अद्भुत, अकल्पनीय, अकथनीय वृहद-विराट स्वरूप है। इतना सबकुछ होने के बाद भी जीव से
अपेक्षा उतनी की की गई है जितना उस जीव की व्यक्तिगत क्षमताओं से संभव हो सकता है।
हमने अलग-अलग व्याख्याएं सुनी, पढ़ी होंगी; लेकिन जिनके माध्यम से हमें वह प्राप्त
हुईं क्या उन्होंने सनातन को सकल रूप से समझा है, पढ़ा है, या सुना है ? क्योंकि
हमारे यहाँ 4 वेद, 18 पुराण, 108 उपनिषद फिर जिन्होंने भगवान को प्राप्त किया उनके
अलग-अलग संप्रदाय बने उसमें हर संप्रदाय के अपने – अपने ग्रंथ/शास्त्र फिर आगे
उनकी टिकाएं, अनुवाद आदि उपलब्ध हैं।
कुल मिलाकर एक जीवन में सनातन को
समझना संभव ही नहीं है। फिर प्रश्न आता है कि जिन्होंने भगवान को पाया तो कैसे
पाया, समझा तो कैसे समझा ? आदि अनेक प्रश्न हम सभी के अंदर पनपते होंगे।
प्रथम यदि सनातन को जानने के प्रश्न
आपके अंदर हैं तो आप पर भगवान की कृपा है क्योंकि बिना उसकी कृपा के ना मैं इस
विषय पर लिख सकता हूँ ना आप आगे पढ़ सकतें है।
सनातन
सनातन
वो है जो शाश्वत है, हमेशा रहने वाला है, सर्व व्यापी है, सर्व स्पर्शी है,
अकल्पनीय, अद्वितीय, सत्य है, सदा के लिए रहने वाला है वह “सनातन” है।
सनातन कोई कर्मकांड या मत की सीमाओं में बंधा कोई संकीर्ण विचार नहीं है बल्कि
प्रकृति की तरह खुला चिर पुरातन व नित् नवीन प्रेरित विचार है। जो कुछ भी अच्छा
है, सकारात्मक ऊर्जा देने वाला है, नित्य प्रेरित करने वाला है, जीवनस्तर में
सुधार लाने मे सहयोगी है, रचनात्मक व समाज उपयोगी क्रियाएं करवाने वाला है यह सब
सनातन के कारण ही संभव है। सनातन की कोई सीमित परिभाषा नहीं है, ना ही कोई शब्दों
में वर्णित कर पाया है। सनातन ऐसा सागर है जो किसी भी अगस्त्य द्वारा पीया या सीमित
नहीं किया जा सकता है। सनातन परमात्मा है, उनकी मानव मात्र के संरक्षण के लिए बनाई
हुई भावना है जिसको भाव द्वारा अनुभव करने को कहा जाता है। सनातन को हम केवल जानने
का प्रयास ही कर सकते है। हमारे जितने भी शास्त्र है उन सभी का समान सारांश यही है
की हम परमात्मा को कभी न भूलें, उनसे प्रेम करें न की दरें जैसा व्यवहार हम अपने घर के बड़ों के साथ करते है/ करना चाहिए व
हमारा जीवन स्तर संयमित रहे, हमारा चरित्र प्रेरक बने, हम मानव आपसी सोहार्द व प्रत्येक
जीव की रक्षा आदि और ये सभी बातें आपस मे जुड़ी हुई हैं। यानि जिसे हम पुण्य कह देते
है वह भी उसी के मन में उत्पन्न होता है जिसे भगवद् प्रेम है या विपरीत भी करे तो जिसे
भगवान से प्रेम नहीं वो उनको अच्छा लगे इस प्रकार के कार्य करने के बारे में विचार
ही नहीं करता। कुल मिलाकर भगवान को किसी भी कारण से स्मरण करने के लिए हम संसार
मे आए है।
लोग पूछेंगे की याद क्यों करना है? तो इसका उत्तर
इतना सरल है लेकिन समझाने में बड़े – बड़े भक्तों को बहुत कुछ सहना पड़ता है। भगवान को
इसीलिए याद करना है क्योंकि एक अच्छे कुशल अभिभावक की तरह भगवान हमको संरक्षण देते
आए है, हमारे उत्पत्ति के कारण हैं, हवा, जल, अग्नि, सूर्य, पृथ्वी यानि जिस किसी भी
वस्तु का हम अनुभव करते है उस सभी के कारण
भगवान ही है और हमको उन्हें धन्यवाद करना है, अब उन्हें धन्यवाद करने का सबका अपना-
अपना तरीका है तो सब वेसे करते है। असल में यही सनातन की विशेष बात है कि यहाँ भक्त
और भगवान का संबंध थोड़ा निजी है, जिसको जेसे लगता है वो वैसे भगवान को मनाने के लिए,
धन्यवाद करने के लिए कभी – कभी कुछ मांगने या शिकायत करने के लिए भी समरण करते हैं।
सैमैटिक में ऐसा कोई तंत्र नहीं है हालांकि उनका अपनाया रास्ता भी एक रास्ता हो सकता
है लेकिन सिर्फ वही एक रास्ता है ऐसा कदापि नहीं है।
एकम् सत् विप्रा बहुधा वदंति॥
सत्य
एक ही है उसे प्राप्त करने के रास्ते/तरीके सबके अलग हो सकतें हैं। सैंकड़ों अवतार,
हजारों संत, नजाने कितनी परम्पराएं, कितने ही महापुरुषों ने अलग - अलग तरीकों से भगवान
को पाया है। प्रहलाद, ध्रुव, मनु, भागीरथ, बाल्मीकि, दशरथ, सुग्रीव, विभीषण, सुदामा,
अर्जुन, भीष्म, महावीर, गौतम बुद्ध, कबीर, गुरुनानक, रविदास, मीरा, धन्ना जात, नर्सी
सभी के अलग – अलग प्रकार के प्रयास है लेकिन एक बात जो समान है वो है भगवद् प्रेम।
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