अमर बलिदानी मदनलाल धींगड़ा
मदनलाल धींगरा यह वह नाम है जिन्होंने उधम सिंह जी से भी पहले इंग्लैंड में एक अंग्रेज अधिकारी कर्जन वाइली की हत्या की थी व भारतीयों के ऊपर हुए अत्याचार का बदला लिया था।
प्रसंग शुरू होता है जब मदनलाल वीर सावरकर जी से एक रेस्त्रां में मिलते हैं। उसी रेस्त्रा में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा होता है Dog And Indians Are Not Allowed। वीर सावरकर जी को वहां बैठने में शर्म महसूस होती है, लेकिन वह देखते हैं कि कुछ भारतवासी वहां पर आराम से बैठकर खाना खा रहे हैं। सावरकर जब उन्हें धिक्कारते हैं तब जो बहस हम दोनों के बीच में होती है उसका जो विचार मदनलाल करते हैं तो वे सावरकर से प्रभावित हो जाते हैं।
भारतीय लोगों को स्वतंत्रता दिलाने के लिए भारत के कुछ लोग इंग्लैंड में अंग्रेजों के गढ़ में इंजिन हाउस के नाम से वहां काम करते हैं वह आंदोलन चलाते हैं वहीं उनकी भेंट पुनः सावरकर से होती है व मदनलाल सावरकर के मित्र बन जाते हैं।
जब वे देखते हैं कि सावरकर किताब भी लिखते हैं, आंदोलन की अगुवाई भी करते हैं व एक बहुत बड़ी भूमिका देश की स्वतंत्रता दिलाने के लिए लगा रहें हैं जबकि उनका परिवार पीछे उनका इंतजार कर रहा है उस स्थिति में जब सावरकर के घर बच्चे ने जन्म लेना है वे सात समुंदर पार इंग्लैंड में है तो उन्हें आश्चर्य होता है। वीर सावरकर की देशभक्ति के मुरीद बन जाते हैं वह अक्सर उनसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों में चर्चा करते हैं।
कर्जन वायली जो कि भारत में रह कर गया हुआ एक अंग्रेज अधिकारी था, जिनका मदनलाल धींगरा के घर आना-जाना था जब वह उनका उदाहरण लेते हुए सावरकर जी से चर्चा करते हैं तब वीर सावरकर कर्जन वायली के द्वारा भारत में किए गए अत्याचारों का उल्लेख करते हैं जिससे मदनलाल धींगड़ा ज्वलित हो उठते हैं व अपने जीवन को कोसने लगते हैं।
मदन लाल धींगरा अशांत मन से सावरकर जी से पूछते हैं कि एक व्यक्ति बलिदान के लिए कब तैयार हो जाता है ? तब उत्तर में सावरकर उन्हें बताते हैं कि "जब व्यक्ति सब कुछ त्याग कर अपने अंतर्मन से यह निश्चय कर ले तब वह बलिदान के लिए तैयार हो जाता है"। ऐसा सुनकर मदनलाल धींगरा निश्चय करते हैं कर्जन वाइली द्वारा आयोजित एक पार्टी में जाते हैं, वह अपने पास रखी हुई पिस्तौल से कर्जन वायली पर गोलियां चलाते हैं व उसे मार गिराते है, मदनलाल स्वयं को भी वहीं मारने का प्रयास करते हैं लेकिन बच जाते हैं। मदनलाल धींगड़ा गिरफ्तार कर लिए जाते हैं उन पर एक अभियोग चलता है व उन्हें फांसी की सजा दे दी जाती है।
अपने स्टेटमेंट मदनलाल कहते हैं कि मैं अब तक भटके हुए पथ पर चलता रहा, लेकिन अब मुझे सही का ज्ञान हो गया है। मेरे पास मातृभूमि को देने के लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन हिंदू होने के नाते मेरा यह धर्म बनता है कि मैं देश के लिए अपना एक जीवन तो न्योछावर कर ही सकता हूं जो मैं कर रहा हूं।
।।भारत माता की जय।।
जेल के बाहर इंडियन हाउस के अन्य क्रांतिकारी मदनलाल धींगरा के कृत्य के लिए निंदा प्रस्ताव पारित करने के लिए एक बैठक बुलाते हैं। उस बैठक में वीर सावरकर बहुत ही प्रभावशाली तरीके से उस निंदा प्रस्ताव का विरोध करते हैं व मदनलाल धींगरा के शौर्य से जो भारत में एक ज्वाला उठेगी सबको अवगत करवाते हैं।
वीर सावरकर जेल में भी मदनलाल धींगड़ा से मिलने जाते हैं।
17 अगस्त 1909 को मदनलाल धींगरा जी को फांसी दे दी जाती है, व वहीं उन्हें इंग्लैंड में ही दफना दिया जाता है। स्वतंत्रता के पश्चात 1976 में उन्हें भारत लाया जाता है।
अमर बलिदानी मदन लाल धींगरा जी को शत शत नमन।
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